माँ….

माँ शब्द नहीं
अथाह सागर है ममता का
जिसमें डूबना आंसा हैं
मगर तैर जाना नहीं
क्या कहूँ माँ
तेरे बारे में
शब्द कुछ समझ आता नहीं
यूँ ही लिख जाती थी
कविताए मिनटों में कई
तेरे लिए मगर
यह वक्त
एक पक्ति लिख पाता नहीं
सोचती हु तेरे बारे में तो
हर सोच कम पड़ जाती यूँ ही
याद करू तेरे खाने को तो
हर स्वाद फिका पड़ जाता यूँ ही
कुछ बात तो थी हर डिश में तेरी
जो स्वाद आज याद आता यूँ ही
कहा नहीं कभी थेंक्स तुम्हें
पर आज कहने को
मन चाहता यूँ ही
जन्म दिया तुमने मुझे
सींचा लहु की इक इक बूंद से
मांगा नहीं कभी बदले में कुछ
दिया सिर्फ दिया
अपने चरणों की धूल से ….

वक्त……

वक्त ये भी गुज़र जाएगा
जो खोया है वह
फिर लौट आएगा
झूम जाएगी वादियाँ वो सुहानी
पत्ता_ पत्ता फिर लहराएगा
ग़मज़दा जो रास्ते आज हैं
कल वही मौंसीकी में
रम _सा जाएगा
पसरा जो आज
अकेलेपन का दौर है
कल वही चाय के प्यालों में
सिमट कर रह जाएगा
गूँज उठेगी शहनाइयों _ सी
घंटिया मंदिर की
वही अजा़न की आवाज में
यह पसरा सन्नाटा
वादियों में कही खो जाएगा
चहलकदमी होगी फिर वही
वहीं बसों का तांडव शोर मचाएगा
वक्त ही तो है
धीरेे _ धीरे यह भी गुज़र जाएगा

ज़िदगी……..

बहुत उलझने है
ज़िदगी में सबकी
इक उलझे दूसरी बंधी होती है
इक टूटे तो दूसरी जुडी़ होती है
रूठ भी जाए सभी
दामन छोड़ भी जाए
तू हर दम हर पल
संग मेरे खडी़ होती है
ना चाहकर भी…..
तूझे जीने का मन करता है
ख़फा होकर फिर तुझमें
रमने का मन करता है
ऐं ज़िदगी खत्म इक पल में तू
हो जाएगी जानते है
पर ज़िदगी में सदियॉ तय कर
ज़ि़दगी से ही उसका
परिचय मांगते है

औरत…………..

ऐ औरत यही कहानी हैं तेरी
बोले तो लगे बेशर्मी तेरी
ना बोले तो बेजुबानी हैं
जन्म लिया औंर बोझ बन गई
डर के सांये मे सबको ले आई
ऑख ना खोली उससे ही पहले
कई लोंगो ने मुझे छोड़ दिया
चाहें वो कचरें की हो सेज या
गटर का शामियाना हो
हो वह श्वान के मुख की शोभा
बस! मुझसे यू दामन छुड़ाना है
बडी़ हुई मैं………अभी कुछ
लोंगो की ऑखे बदल गई
चाचा,ताऊ,भाई या फुफा
हर रिश्तें नेऑखों से मुझको नौंच लिया
पैंनी नज़र गड़ चुकी है मुझपर
बस मौंके की आवनदानी हैं
कब मार झपट्टा खा जाए मुझको
यही वक्त की कहानी हैं
जो हाथ कभी रहते थे सिर पर
कब वह नीचे खिसक गए
भूल गए मर्यादा अपनी
बस वैहशी बन टूट पड़े
समझ ना पाई मैं खुद भी सब
शायद बुद्धि मेरी मंद _सी थी
ऐ औंरत यही कहानी है तेरी
जब लांघी घर की सरहद
कुछ बनकर दिखलाऊँगी
यही सोंच कर निकल पडी़ हुँ
अपना अस्तित्व बनाऊँगी
तभी नेवले पडे़ थे पीछे
घात लगाए सपनों पर
हवस की ऑधी यूँ छाई उन पर
सपनों को मेरे धूल किया
आत्मसम्मान को हर पल
मेरे चूर_चूर किया
सबल बन फिर भी लड़ना चाहा
इज्जत का नारा
घरवालों ने बुलंद किया
किया सामना पहले खुद से
फिर ओंरो को चकचूर किया
आई अब सपनों की बेला
नए घर तुझे जाना है
हुई पराई हमसे तू लाडो़
वहीं आगे की ज़िदगी बितानी है
यही सुन _ सुन मैं बड़ी हो गई
आज वो बेला आई है
सुबह जो अपने थे सपनें
शाम को वही पराए है
ससुराल के नियम नए है
अब उनसे ताल जमाना है
जीवन के नए अध्याय से
खुद को खुद रू-बरू कराना है
ऐ औरत यही कहानी है तेरी…….

खामोशियॉ

कभी खामोशियॉ भी समझा देती थी

मेरे दिल की बातें तुम्हें

आज अलफा़ज भी कम पड़ते हैं

बात वो पुरानी हुई जब तुम

आंखें भी पढ़ लिया करते थे तुम

ना कहते हुए भी

शब्दों को गढ़ लिया करते थे तुम

मेरी चुप्पी को भी

अपनी सांसो मे बुन लिया करते थे तुम

बातें यह पुरानी हुई

आज की नहीं सदियों

पुरानी सी लगती हैं

अनकहाँ प्यार……

प्यार वो ही नहीं जो कहा जाए
बिन कहे भी बातें हुआ करती है
बिना जले भी कई दिल
दीयों-से “जल” जाते है
बिना मुलाकात के भी
हर रात बात हुआ करती है
जब चाँद भी अपनी चाँदनी में समाया रहता है
तभी तुमसे कई बार
ये आँखे चार हुआ करती है
सर्द हवाओं का काफिला
अपने ज़ोर पर हो
तभी मेरा हाथ
तेरे हाथ को कई बार
सम्भाले रखता है
प्यार वो ही नहीं जो कहा जाए
बिन कहें भी बातें हुआ करती हैं